संदेश

ज़िन्दगी का बोझ

ये कैसी ज़िन्दगी का बोझ हम उठा के चल दिये आंसू मिला हर मोड़ पर जो भी पल जिये छोटा सा एक दिल और तमन्ना हज़ार थी हर एक तमन्ना पे जी भर के रो दिए जब भी की उम्मीदे चराग से अपने हाथों को हम जला लिए रोशन फ़कत हो न सका  मेरे दिल का कोई कोना रोशनी की चाहत लिए दर दर भटका किए ये कैसा धुआँ सा था इर्दगिर्द मेरे  हम तुम्हें देखने की खातिर  अब्सार नम किये आया जब भी हाथ, हाथ में एक फ़ासिला था साथ में ज्यूँ ही चले हम थामने खुद से आज़िम नही किए इज़्तिरार रह गई किस्मत में हमारी कोई ज़हीर मिल न सका और नातमाम हम हुए

तुम मुझे याद आओगी

जब देखूंगा नम आंखें किसी की जब देखूंगा बेबसी किसी की जब देखूंगा अपनों से अपनों की बेरुखी जब देखूंगा कोई टूटी सी ज़िन्दगी तुम मुझे बहुत याद आओगी... जब देखूंगा किसी कॉलेज के बाहर बैठा इंतज़ार करता कोई लड़का देखूंगा जब तेज बारिश में  गाड़ी से जाता कोई लड़का किसी लड़की को जाते हुए लेने तुम मुझे बहुत याद आओगी... देखूंगा जब किसी लड़के को  किसी लड़की को स्कूटी सिखाते हुए उसके पीछे भागते देखूंगा जब ऑफिस के बाहर  किसी लड़के को इंतजार करते देखूंगा जब ठंडी रातों में मोमोज़ के ठेले पर रुकते किसी लड़के और लड़की को तुम मुझे बहुत याद आओगी... देखूंगा जब भेलपुरी के खोमचे के  पास खड़े किसी लड़के और लड़की को देखूंगा जब चाय की टपरी पर किसी लड़के और लड़की को देखूंगा जब किसी फास्टफूड के ठेले के पास खड़ी कार में बैठे किसी लड़के और लड़की को तुम मुझे बहुत याद आओगी... देखूंगा जब बस स्टेशन के बाहर खड़ी बस में बैठी किसी लड़की को छोड़ने आये लड़के की आंखों में उतरे आंसू और दिल में उठती बेचैनी और फिक्र को देखूंगा जब किसी पिक्चर हॉल में हाथों में हाथ थामे किसी लड़के और लड़की को तुम मुझे बहुत याद आओगी... देखूंगा जब किसी लड़की...

वो लाचार बूढ़ा

वो लाचार बूढ़ा आज द्वार पर आई सहसा एक आवाज आवाज कुछ जानी - पहचानी सी सुनते ही आवाज लपक कर बाहर आया एक बुजुर्ग दंपती ने हाथों को फ़ैलाया जेब से निकाल पांच-पांच के दो सिक्के उस बुजुर्ग महिला के हांथों में थमाया बदले में उसने भी दी दिल से दुआएं कितनी सस्ती है दुआ इस जग में ये सोच के दिल भर आया फिर जैसे उसकी पुरानी फ़रियाद  याद दिमाग में आई अम्मा,अबकी आप की साड़ी फिर नही ला पाया वो बोली बड़े धीरे से होठों पर मुस्कान बिखेरते कोई बात नही बेटा अगली बार तू ला देना वैसे भी जा रही हूँ अपने गाँव परसों मैंने पूछा बड़ी अचरज से उससे क्यों,अभी तो आई थी तुम अपने गाँव से लॉकडाउन से आने के बाद उसने बताया था खाने की थी बहुत दिक्कत कभी नमक रोटी तो कभी पानी पीकर काम चलाया था उससे मेरी बात यूँ अचानक न होती थी हर शुक्रवार तय था  पिछले पांच सालों से बोली के बिटिया की तबियत खराब है इसलिए जाना है जरूरी रेल नही चलती बस से है जाना बिठाते नही रेल में कहते आधार है जरूरी चल रही थी बात जब  चेहरा दिखाई एक नया सा दिया एक मुरझाए हुए पेड़ सा एक वृद्ध खड़ा मुझे देख रहा मानो कह रहा हो आंखों से अपनी बाबू जी मुझे भी दे...

बेरोजगारी

रोटी,कपड़ा और मकान नॉकरी या फिर अपनी दुकान प्रश्न हर किसी के मन में कौंधता है वो जो इन तीनों के बीच में खड़ा है जीवन के जरूरी अंग हैं ये भाग नही सकता जिनसे छुड़ा के अपनी जान रोटी ,कपड़ा और मकान !! करके पढ़ाई पूरी एक नॉकरी है जरूरी मां,बाप और बच्चे तीनो देखते हैं एक सपना खाने को मिले खाना, तन ढांकने को कपड़ा और बड़ा न सही , छोटा सा घर हो अपना जब करके पढ़ाई पूरी जाता है ढूढ़ने एक नॉकरी जगह नही है खाली बच्चों बजाओ ताली किस्सा शुरू है होता जब आदमी है रोता कभी ये दफ्तर कभी वो दफ्तर खाता है वो रोज़ ठोकर क्योंकि डिग्री है उसकी छोटी और सिफारिशें बड़ी है एक नॉकरी के लिए भीड़ बहुत बड़ी है या तो नाक रगड़ो या फिर पैर उनके पकड़ो फिर भी नही मिलेगी कुछ तो कमी खलेगी घर उसको चलाना है खाना भी तो खाना है एक नॉकरी के खातिर सारे जतन है करता डिग्री बटोरता है  फिर उनको परोसता है मिलती नही है फिर भी ये नॉकरी निराली है आधों के घर है खाली कुछ के घर दीवाली है बेरोजगारी का ये आलम हर युग पे ही छाया है क़ाबिल हैं घर पर बैठे नाक़ाबिल नॉकरी पाया है बेरोजगारी का ये अजगर अपना बदन बढ़ाता है जाने कितनों को रोज़ लील जाता है

कर्म और भाग्य

कर्म और भाग्य चलते हैं साथ एक दूजे की उंगली पकड़कर एक दूजे के कंधे पर अपना सिर है रखकर आजमाने को भाग्य अपना जब मानव कर्म को करता आड़े आ जाते हैं कितने ही प्रस्तर इन प्रस्तरों से ही है तुझको राह बनानी और लिखनी है अपनी कहानी... और लिखनी है अपनी कहानी...

नारी है शक्ति

नारी गढ़ती है नर को नर के बाहर और भीतर को उसकी छाया के नीचे जो पला है थाम के उँगली जो उसकी चला है है वही नर, एक दिन बड़ा होकर करता है नारी की कोमल देह प्रस्तर उसके मन को कुचलकर  चाहता है आगे बढ़ना अपनी श्रेष्ठता को साबित करना कभी गालियों के बाण से वो बींधता है तो कभी उसको अपने शब्दों से चीरता है जब नही भरता है इससे भी, उसका मन, तन और उसका अहम रौंदने को फिर उसे वो जो कदम उठाता काँपता भी नही इसपर विधाता नारी की देह पर वो नर, जो जुल्म ढाता मारता, पीटता फिर भी तरस न आता अपनी काम इच्छा को मिटाने अपने पौरूष का झूठा गर्व दिखाने मसल के रख देता है वो उसकी देह कोमल मार देता है उसके एहसास निर्मल एक ही पल में मिटा देता मानवता  करता है जब अमानवीय काम ये छोटी,बड़ी हो या अधेड़ उम्र की वो उसकी आँखों में पड़ी हो धूल ज्यों भूल जाता है नारी का सम्मान वो हर तरफ से आती है बेबस चीख जिसको देखो देने लगता है मुफ्त में सीख ढूंढने लग जाते हैं नारी में ही दोष थोड़े दिन दिखाते हैं सब मिलके रोष कहने को हम मानव कहलाते पर नही खुद में खुद के दोष पाते संस्कारों के बीज बचपन से बेटी में ही बोए जाते क्यों नही हम बेटों क...

आखिर कब तक ?

जब से ख़बर पढ़ी है,देखी है अजीब सी मन में कसमसाहट है। अजीब सी घृणा के भाव आ रहे हैं जा रहे हैं। गुस्सा बेहिसाब आ रहा है पर किसपर करूँ ये समझ नही आ रहा है। दोषी कौन है ? ये प्रश्न यक्ष प्रश्न बनकर सामने खड़ा हुआ है जिसका सही जवाब नही सूझ रहा है अगर आप को मिले तो जरूर कमेंट करें ताकि महसूस कर सकूं के इंसानों के बीच में हूँ नरपषुओं के बीच में नही क्योंकि मित्र मंडली में संख्या बहुत है पर शायद उनकी जुबान भी जाति,धर्म के तालों से बंद है। #उत्तर प्रदेश के #हाथरस जिले में मनीषा नाम की लड़की का गैंगरेप हुआ है..लड़की दलित वर्ग से आती है..लड़की की जुबान काट दी गई...रीढ़ की हड्डी( स्पाइनल कॉर्ड) तोड़ दी गई है...और आज दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उस लड़की की मौत हो गई है... अब प्रश्न ये उठ रहा है कि गैंग रेप किसका हुआ उस लड़की का या हमारी संस्कृति का... सरकार के खोखले वादों का ....या झूठे नारों ,स्लोगन  का..जिसमें बेटी बचाओ को बहुत बढ़ा चढ़ा के प्रचारित किया जाता है... आज 2020 में भी जाति,धर्म की भावना खत्म नही हुई है हम सब के मस्तिष्क से...तभी तो सरकार अलग अलग वर्ग,जाति, धर्म के लोगों में तरह तरह की योज...