वो लाचार बूढ़ा
वो लाचार बूढ़ा आज द्वार पर आई सहसा एक आवाज आवाज कुछ जानी - पहचानी सी सुनते ही आवाज लपक कर बाहर आया एक बुजुर्ग दंपती ने हाथों को फ़ैलाया जेब से निकाल पांच-पांच के दो सिक्के उस बुजुर्ग महिला के हांथों में थमाया बदले में उसने भी दी दिल से दुआएं कितनी सस्ती है दुआ इस जग में ये सोच के दिल भर आया फिर जैसे उसकी पुरानी फ़रियाद याद दिमाग में आई अम्मा,अबकी आप की साड़ी फिर नही ला पाया वो बोली बड़े धीरे से होठों पर मुस्कान बिखेरते कोई बात नही बेटा अगली बार तू ला देना वैसे भी जा रही हूँ अपने गाँव परसों मैंने पूछा बड़ी अचरज से उससे क्यों,अभी तो आई थी तुम अपने गाँव से लॉकडाउन से आने के बाद उसने बताया था खाने की थी बहुत दिक्कत कभी नमक रोटी तो कभी पानी पीकर काम चलाया था उससे मेरी बात यूँ अचानक न होती थी हर शुक्रवार तय था पिछले पांच सालों से बोली के बिटिया की तबियत खराब है इसलिए जाना है जरूरी रेल नही चलती बस से है जाना बिठाते नही रेल में कहते आधार है जरूरी चल रही थी बात जब चेहरा दिखाई एक नया सा दिया एक मुरझाए हुए पेड़ सा एक वृद्ध खड़ा मुझे देख रहा मानो कह रहा हो आंखों से अपनी बाबू जी मुझे भी दे...