नारी है शक्ति
नारी गढ़ती है नर को
नर के बाहर और भीतर को
उसकी छाया के नीचे जो पला है
थाम के उँगली जो उसकी चला है
है वही नर, एक दिन बड़ा होकर
करता है नारी की कोमल देह प्रस्तर
उसके मन को कुचलकर
चाहता है आगे बढ़ना
अपनी श्रेष्ठता को साबित करना
कभी गालियों के बाण से वो बींधता है
तो कभी उसको अपने शब्दों से चीरता है
जब नही भरता है इससे भी,
उसका मन, तन और उसका अहम
रौंदने को फिर उसे वो जो कदम उठाता
काँपता भी नही इसपर विधाता
नारी की देह पर वो नर, जो जुल्म ढाता
मारता, पीटता फिर भी तरस न आता
अपनी काम इच्छा को मिटाने
अपने पौरूष का झूठा गर्व दिखाने
मसल के रख देता है वो उसकी देह कोमल
मार देता है उसके एहसास निर्मल
एक ही पल में मिटा देता मानवता
करता है जब अमानवीय काम ये
छोटी,बड़ी हो या अधेड़ उम्र की वो
उसकी आँखों में पड़ी हो धूल ज्यों
भूल जाता है नारी का सम्मान वो
हर तरफ से आती है बेबस चीख
जिसको देखो देने लगता है मुफ्त में सीख
ढूंढने लग जाते हैं नारी में ही दोष
थोड़े दिन दिखाते हैं सब मिलके रोष
कहने को हम मानव कहलाते
पर नही खुद में खुद के दोष पाते
संस्कारों के बीज बचपन से बेटी
में ही बोए जाते
क्यों नही हम बेटों को भी सिखला ये पाते
नारी भी है फूल सी सुकुमार कोमल
इसका करना है सम्मान हर पल
देवी बनकर पूजी जाती है घरों में
दो घरों की रोशनी है ये शक्ति
नारी की कई रूप में करनी है भक्ति
तब कहीं जाकर तुम्हारा उद्धार होगा
देवता खुश होंगे और जगत का कल्याण होगा
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