राम के नाम को बदनाम न करो

त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने धरती पर  रावण के अत्याचारों से दुखी जनमानस,ऋषियों को मुक्ति दिलाने के लिए राम का अवतार लिया। राम के रूप में उन्होंने जनता के सामने एक आदर्श पुत्र,आज्ञाकारी शिष्य,स्नेहमयी भाई, प्रेममयी पति,और आदर्श राजा का उदाहरण पेश किया जिसके कारण वो एक सामान्य मानव से भगवान राम बन गए उनके इन्हीं गुणों के कारण जनमानस ,ऋषि,शबरी, केवट यहां तक वानर और राक्षस भी उनकी पूजा करने लगे और उन्हें अपना आराध्य मानने लगे।
राम ने अपने गुणों, कर्मों और कार्य से किसी में कोई भेद नही किया। जाति, धर्म,रंग,गरीबी,कुल उनके सामने बौने नजर आते थे इसलिए वो जन जन में पूजे जाते थे और उनके साथ उनके सहयोगी भी पूजे गए।
राम को हर युग में भगवान मान कर भक्ति करने वालों की कभी कमी नही रही। इसीलिए लोग अपने बच्चों का नाम भी राम रखते रहे या राम से मिलते जुलते नाम जैसे रामनाथ,रामप्रसाद, सियाराम आदि। संविधान की मूल प्रति में भी रामदरबार के चित्र को स्थान दिया गया। यहाँ तक के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मरते समय होठों पर हे राम के शब्द थे। एक राष्ट्रीय पार्टी ने तो राम के नाम का जैसे पेटेंट करा लिया हो मतलब अगर उनके नेता उनके समर्थक राम का नाम लें तो भक्ति और कोई दूसरी पार्टी के नेता अगर राम भक्ति की बात करें तो ढोंग,दिखावा और न जाने क्या क्या। वर्तमान में जय श्री राम के नारे को चुनावी नारे में परिवर्तित कर दिया गया है मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जैसे ही किसी सियासी दल की सभा हो रही होती है या धरना प्रदर्शन करने की बात आती है युवाओं के बीच जय श्री राम का नारा बुलंद होने लगता है।
ऐसा नही है कि जय श्री राम के नारे से किसी को कोई ऐतराज है नही बिल्कुल नही भगवान में श्रद्धा रखने वालों को कभी भी जय श्री राम के उद्घोष से कोई दिक्कत नही होगी। 
पर सोचने वाली बात ये है कि जब देश 21वीं सदी में प्रवेश कर चुका है तो युवाओं के बीच में तकनीकी, शिक्षा, रोजगार या भारत को कैसे विकसित देशों के साथ खड़ा किया जा सके जैसे विचारों का आदान प्रदान होना चाहिए न कि धरना प्रदर्शन में शामिल होकर भगवान के नाम को बदनाम करना चाहिए।
वैसे भी जय श्री राम के नारे का उद्घोष समुद्र तट पर जब राम की सेना रावण से युद्ध करने जा रही थी तब वानरों में जोश भरने के लिए लगाया जाता था । आज न तो भगवान राम किसी युद्ध में भाग लेने जा रहे हैं और न रावण लोगों पर अत्याचार कर रहा है। 
हम अपनी दिनचर्या में वैसे भी एकदूसरे से हालचाल लेने के लिए राम-राम का सम्बोधन करते आये हैं और इससे प्रेम और भाईचारे की भावना का जन्म होता है। और पूजा स्थल पर हम जय सियाराम का नाम लेते हैं जिसमें राम के साथ सीता माता का भी नाम लिया जाए और हमें परमानंद की अनुभूति हो।
वर्तमान में जिस तरह से राम के भक्तों की संख्या बढ़ी है अब चाहे वो किसी दल के नेता हों या उनके समर्थक उससे साफ जाहिर होता है कि वो राम के नाम के सहारे अपने हितों को पूरा करना चाहते हैं। कोई राम मंदिर के निर्माण में अपनी भूमिका जगजाहिर करता है और अपनी पीठ थपथपाता है तो कोई भगवान राम के दर्शनों के लिए जनता को बस उपलब्ध कराने का वादा करता है और राम के नाम के सहारे अपनी चुनावी नैया पार करना चाहता है।
हमें इस बात को अच्छे से समझना होगा कि राम के नाम का उद्घोष करने या उनके नाम का सियासी इस्तेमाल करने से भक्ति नही होती बल्कि सही मायने में हम यदि राम के गुणों को अपने अंदर आत्मसात कर लें तो इससे भगवान भी प्रसन्न होंगे और हमारे परिवार और समाज के लोग भी।
क्योंकि यदि हम एक अच्छे पुत्र,आदर्श पति,और समाज के हर वर्ग का हित चाहने वाले गुणों को अपना लें तो हमें भी साधारण मानव से भगवान बनने में देर नही लगेगी।

हमारे अंदर राम के गुणों की कमी के कारण ही समाज में अपराध बढ़ रहा है। यदि हम अपने बच्चों,भाइयों,समर्थकों को राम के गुणों से परिचित कराएंगे तो समाज से हर तरह की बुराइयों को खत्म करने में सफल होंगे। इसकी शुरुआत हमें अपने आप से करनी होगी हमें कोशिश करनी होगी कि हम भगवान राम के गुणों को अपने अंदर धारण करें जिससे हम समाज में लोगों के लिए प्रेरणा बन सकें और यदि ऐसा करने में हम कामयाब रहे तो ही रामराज्य की कल्पना साकार हो सकेगी।
इसके विपरीत यदि हम केवल जय श्री राम के नाम का इस्तेमाल चुनावी नारों के रूप में करेंगे और उनके दिखाए आदर्शों पर नही चलेंगे उनके गुणों को अपने अंदर विकसित नही करेंगे तो हम सिर्फ राम के नाम को बदनाम करेंगे।

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