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ज़िन्दगी का बोझ

ये कैसी ज़िन्दगी का बोझ हम उठा के चल दिये आंसू मिला हर मोड़ पर जो भी पल जिये छोटा सा एक दिल और तमन्ना हज़ार थी हर एक तमन्ना पे जी भर के रो दिए जब भी की उम्मीदे चराग से अपने हाथों को हम जला लिए रोशन फ़कत हो न सका  मेरे दिल का कोई कोना रोशनी की चाहत लिए दर दर भटका किए ये कैसा धुआँ सा था इर्दगिर्द मेरे  हम तुम्हें देखने की खातिर  अब्सार नम किये आया जब भी हाथ, हाथ में एक फ़ासिला था साथ में ज्यूँ ही चले हम थामने खुद से आज़िम नही किए इज़्तिरार रह गई किस्मत में हमारी कोई ज़हीर मिल न सका और नातमाम हम हुए