बेरोजगारी

रोटी,कपड़ा और मकान
नॉकरी या फिर अपनी दुकान
प्रश्न हर किसी के मन में कौंधता है
वो जो इन तीनों के बीच में खड़ा है
जीवन के जरूरी अंग हैं ये
भाग नही सकता जिनसे
छुड़ा के अपनी जान
रोटी ,कपड़ा और मकान !!
करके पढ़ाई पूरी एक नॉकरी है जरूरी
मां,बाप और बच्चे तीनो देखते हैं एक सपना
खाने को मिले खाना, तन ढांकने को कपड़ा
और बड़ा न सही , छोटा सा घर हो अपना
जब करके पढ़ाई पूरी
जाता है ढूढ़ने एक नॉकरी
जगह नही है खाली
बच्चों बजाओ ताली
किस्सा शुरू है होता
जब आदमी है रोता
कभी ये दफ्तर कभी वो दफ्तर
खाता है वो रोज़ ठोकर
क्योंकि डिग्री है उसकी छोटी
और सिफारिशें बड़ी है
एक नॉकरी के लिए
भीड़ बहुत बड़ी है
या तो नाक रगड़ो
या फिर पैर उनके पकड़ो
फिर भी नही मिलेगी
कुछ तो कमी खलेगी
घर उसको चलाना है
खाना भी तो खाना है
एक नॉकरी के खातिर
सारे जतन है करता
डिग्री बटोरता है 
फिर उनको परोसता है
मिलती नही है फिर भी
ये नॉकरी निराली है
आधों के घर है खाली
कुछ के घर दीवाली है
बेरोजगारी का ये आलम
हर युग पे ही छाया है
क़ाबिल हैं घर पर बैठे
नाक़ाबिल नॉकरी पाया है
बेरोजगारी का ये अजगर
अपना बदन बढ़ाता है
जाने कितनों को रोज़ लील जाता है


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