कर्म और भाग्य
कर्म और भाग्य
चलते हैं साथ
एक दूजे की उंगली पकड़कर
एक दूजे के कंधे पर अपना सिर है रखकर
आजमाने को भाग्य अपना
जब मानव कर्म को करता
आड़े आ जाते हैं कितने ही प्रस्तर
इन प्रस्तरों से ही है तुझको राह बनानी
और लिखनी है अपनी कहानी...
और लिखनी है अपनी कहानी...
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