जिन्ना,सावरकर, गाँधी या फिर मंहगाई,बेरोजगारी और लचर कानून व्यवस्था

उत्तर प्रदेश का चुनाव जैसे जैसे नज़दीक आता जा रहा है पक्ष विपक्ष के राजनीतिक योद्धाओं के तरकश से अलग अलग तीर निकल कर जनता के सामने बरस रहे हैं।
एक तरफ आज़ादी के पहले के माफीवीर की माफी किसके कहने पर हुई तो दूसरी तरफ पटेल,नेहरू,गाँधी और जिन्ना का राग अलापा जा रहा है। जहाँ भाजपा सावरकर को नायक बनाने में गांधी का इस्तेमाल कर रहे हैं तो अखिलेश यादव सरकार बनाने के लिए 18 से 20 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय का वोट पाने के लिए जिन्ना की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं।
2017 के चुनावों की तरह फिर से उत्तर प्रदेश 2022 के चुनाव को हिन्दू मुस्लिम में बांटने की तैयारी हो रही है जिससे साफ दिखाई पड़ता है कि कुर्सी के लालची इन नेताओं को उत्तर प्रदेश की मुख्य समस्याओं से कोई लेना देना नही। इन्हें तो बस लोगों को राष्ट्रवाद की चाशनी में चुनाव को जनता के सामने परोशना है जिससे जनता राष्ट्रवाद के खोखले सूप को चाटती रहे और नेता कुर्सी रूपी हड्डी को ले उड़ें।
कोरोना महामारी के बाद से जनता की कमर टूट गई है और उस पर दिन प्रतिदिन बढ़ रही महंगाई डायन ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। लोगों को फ्री समान देने की होड़ लग गई है और हर दल अपने अपने फ्री के सामानों की लिस्ट जारी करने में जुटा है।
सत्ता पक्ष के लोग मुफ्त वैक्सीन, मुफ्त राशन, का प्रचार कर रहे हैं तो विपक्षी मुफ्त में बिजली,सिलेंडर, मोबाइल, स्कूटी, यात्रा करने का वादा।
कुल मिलाकर सबके सब जनता को मूर्ख बनाने में जुटे हैं ताकि येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल हो जाए। अब ऊंट किस करवट बैठेगा ये आने वाला वक्त तय करेगा। फिलहाल मुख्य मुद्दे न तो नेताओं की जुबान पर है न ही tv डिबेट कर रहे एंकर और न ही जनता की जुबान पर । पर सच्चाई यही है कि लोगों को घर गृहस्थी चलाने में बहुत असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
पेट्रोल, डीज़ल के दाम दिन प्रतिदिन अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ते नज़र आ रहे हैं। गैस के दाम भी आसमान छूते नज़र आ रहे हैं जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में जहाँ लोगों को मुफ्त में सिलेंडर बांटे गए थे वो लोग फिर से लकड़ियों को जलाने में मजबूर हैं। खाने वाले तेल,रिफाइंड के दाम बेतहाशा वृद्धि कर चुके हैं जिसके कारण लोगों को अपनी रसोई चलाने में वहुत दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं। 
सब्जियों, दाल, चाय,चीनी आदि की रोजमर्रा की चीजें के दाम आम आदमी की जेब पर डाका डाल रहे हैं। बेरोजगारी का आलम ये है कि आज हर घर में पढ़े लिखे नवयुवक, नवयुवती अपना समय मोबाइल में व्हाट्सएप या फेसबुक और इंस्टाग्राम में दे रहे हैं। आलम ये है कि समझ में नही आता कि देश में डाटा फ्री है कि शिक्षित युवा। भारत जैसे देश में जहाँ युवाओं की सबसे बड़ी आबादी है जिसका इस्तेमाल देश को आगे ले जाने में किया जाना था उसका इस्तेमाल देश को पीछे ले जाने में किया जा रहा है। युवाओं के मन में झूठे राष्ट्रवाद के बीज बोए  जा रहे हों उनके प्रगतिशील मस्तिष्क को कुंद करके उसमें धर्म विशेष के प्रति नफ़रत का जहर घोला जा रहा है जिसका दूरगामी परिणाम बहुत भयानक है।
आज युवाओं को विकास, बेरोजगारी, महंगाई के मुद्दों से भटका कर सावरकर, गाँधी, नेहरू,पटेल और अब जिन्ना के नाम पर तोड़ा मरोड़ा जा रहा है। जो बीत गया है उसकी याद दिलाई जा रही है हमें बीते हुए कल से कोई लेना देना नही हमें तो अपनी क्षमताओं को पहचान कर आगे बढ़ना है पर ऐसा लगता है नेता नही चाहते हैं कि हम पढ़ लिखकर उनसे सवाल पूछें उनसे नौकरी मांगे इसीलिए तो इन मुद्दों से ध्यान भटकाकर पूरा ध्यान धर्म की राजनीति पर दिया जा रहा है ताकि हम सब धर्म ,जाति,हिन्दू ,मुस्लिम, गाँधी, सावरकर, पटेल,जिन्ना में उलझे रहें और जरूरी मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी, लचर कानून व्यवस्था,महिलाओं पर अत्याचार पर सरकार से सवाल न पूछें और इसी बात का फायदा उठाकर ये नेता चुनाव जीतकर अपना उल्लू सीधा कर लें।
जरूरत है कि जनता नेताओं के बनाये इस जाल में न फंसे और जो भी नेता आपके दरवाजे वोट मांगने या अपनी पार्टी को समर्थन देने की बात करे सबसे पहले उसकी पार्टी का पिछला घोषणापत्र उससे मांगे और उससे पूछें कि उसकी सरकार ने क्या सारे वादे पूरे किए और अबकी बार अगर वो उसको वोट देकर विजयी बनाये तो वो क्या लोगों को उनकी समस्याओं से निजात दिला पाएंगे यकीन मानिए अगर जनता जाग गई और उसने धर्म ,जाति से ऊपर उठकर विकास,रोजगार, महिला सुरक्षा,कानून व्यवस्था की बात उठानी शुरू कर दी तो सच मायनों में लोकतंत्र सफल होगा और फलेगा फूलेगा भी।

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