कोरोना महामारी
कोरोना महामारी
पिछले एक साल से ज्यादा हो गया पर इस बीमारी का लक्षण न जनता की समझ आया और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को
डॉक्टरों की टीम और वैक्सीन के शोधकर्ताओं ने भी इस महामारी के बारे में तमाम जानकारी बताई जो कभी सही तो कभी समझ से परे लगीं।
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति, एलोपैथिक दवाइयों ने भी इस बीमारी पर कभी तो विजय प्राप्त करने की कोशिश की तो कभी इस महामारी के सामने नतमस्तक नजर आई।
अनपढ़ से लेकर पढ़े लिखे लोग भी इस महामारी के बारे में तमाम बातें करते नज़र आये क्योंकि इसके जो लक्षण बताए गए उसके विपरीत दो कदम आगे रही ये महामारी।
पिछले साल जैसा कि न्यूज़ चैनलों, पेपर, सोशल मीडिया ने बताया कि कोरोना महामारी का वायरस चीन के वुहान शहर से चल कर पूरे विश्व में फैल गया और भारत में तबलीगी ज़मात के लोगों को इसको आगे बढ़ाने मे जिम्मेदार ठहराया गया। लाखों की संख्या में प्रवासियों को एक शहर से दूसरे शहर को जाना पड़ा। लोग आर्थिक रूप से कंगाल हो गए लाखों लोगों के रोजगार छीन लिए मोदी सरकार की अपरिपक्वता ने।
लोगों को लोकडौन के नाम पर घर बैठा दिया गया पूरे देश में जो जहां था वही रोक दिया गया। बसों ,ट्रेनों को रोक दिया गया लोगों ने पैदल चलकर,अपने निजी वाहनों से चलकर अपने घरों का रास्ता तय किया और जो मीलों के सफर को नही तय कर पाए उन्हें मौत के आगोश में जाना पड़ा।
लोगों से कोरोना महामारी भगाने के लिए घंटे,शंख,थाली बजवाई गई। मोमबत्ती, मोबाइल टोर्च जलवाई गई। इसी बीच प्रधानमंत्री केयर्स फंड बना और करोड़ों, अरबों रुपये कोरोना महामारी के नाम पर इक्कठा किये गए जिसका कोई हिसाब नही दिया गया।
लोगों को सरकार की तरफ से केवल गेहूं, चावल और कभी कभार चना मिला न बिजली के बिल माफ हुए न बच्चों की फीस माफ हुई और न ही कोई आर्थिक मदद दी गई। दूरदर्शन पर लोगों को 90 के दशक के रामायण, महाभारत सीरियल दिखाए गए ताकि लोगों का ध्यान सरकार की कमी पर न जाए और लोग मनोरंजन में लगे रहें।
देश में हज़ारों लोग इस महामारी के शिकार हुए और हज़ारों लोगों को इसके बाद हुई आर्थिक मंदी के कारण अपनी जान गवानी पड़ी।
सरकार ने लोगों से जल्दी ही इस महामारी के टीके बनाये जाने का वादा किया और आखिरकार वो घड़ी भी आई जब ये कहा गया कि टीका बन कर तैयार हो गया है और लोकडौन धीरे धीरे खोल दिया गया। करीब 5 महीने इस महामारी की विभीषिका झेलने के बाद देश फिर से इस उम्मीद से खड़ा होने में लग गया कि टीका बना लिया गया है तो जल्दी ही अब इस संकट से छुटकारा मिल जाएगा।
अब शुरू हुआ टीकों को बाहर भेजने का दौर मतलब सबसे बड़ी आबादी वाले देश में लोगों का टीकाकरण हुआ नही और दूसरे देशों में टीके भेजे जाने लगे नतीजा ये हुआ कि टीकों की कमी हो गई लोग टीका केंद्रों से जा जाकर वापस लौटने लगे और प्रधानमंत्री इस बात पर खुश होकर के भारत में टीके को बना लिया गया है अपनी पीठ थपथपाने लगे। मीडिया ने भी अंधभक्ति करते हुए मोदी को कोरोना योद्धा घोषित करने में देर नही लगाई। ऐसा लगने लगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना महामारी की जंग जीत ली है और स्वयं को नायक घोषित करवा के चुनावों की तरफ देश को मोड़ दिया।
जनता ने भी समझ लिया कि कोरोना महामारी से निजात मिल गई। स्कूलों, कॉलेज को खोल दिया गया और लोग अपने अपने कामकाज में फिर से लौटने लगे।
प्रधानमंत्री मोदी,गृहमंत्री अमितशाह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी स्टार प्रचारक बनकर केरल,ओडिशा,पश्चिम बंगाल में चुनावी रैलियों में व्यस्त होने लगे। लोगों को टीकाकरण का लॉलीपॉप देकर नेताओं ने फिर से चुनावी बिगुल बजा दिया।
इसी बीच उत्तराखंड में कुंभ मेले का आयोजन भी शुरू हो गया जनता कोरोना महामारी को भूलकर मंदिरों, मस्जिदों, सार्वजनिक जगहों,कुम्भ मेला अर्थात हर जगह जाने लगी और सरकार की तरह सबने समझा के शायद अच्छे दिन आ गए हैं।
नए वर्ष 2021 के आगाज के बाद ऐसा लगा कि सब ठीक होगा 45 वर्ष से ऊपर के लोगों को टीकाकरण की शुरुआत हुई और उससे नीचे वाले लोगों को टीके की उम्मीद पर छोड़ दिया गया अब एक सवाल ये भी उठता है कि टीकाकरण करने में उम्र का अंतर क्यों ? कहीं इसलिए तो नही के 45 वर्ष से ऊपर का वर्ग मतदान करने में ज्यादा अहम भूमिका अदा करता है ख़ैर अब कारण कोई भी हो जिसको भी मिला कम से कम मिला तो पर यहां भी लोगों को लाइन में खड़ा होना पड़ा और कई जगह से ये शिकायत भी आई के टीकाकरण के फलस्वरूप कई लोगों के खून में थक्के जमने के कारण उनकी मौत हो गई। इसका नकारात्मक प्रभाव ये भी हुआ कि बहुत से लोग डर के कारण टीका लगवाने नही गए।
इसी बीच चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से टीका उत्सव मनाने को कहा। आपदा में अवसर ढूढने वाले प्रधानमंत्री ने महामारी में उत्सव की खोज करके लोगों से इसे मनाने की अपील कर दी और खुद बंगाल की रैलियों में व्यस्त हो गए।
अचानक महामारी ने फिर से करवट ली और शुरू हुआ कोरोना 2.0 का दौर फिर से कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने लगे और नतीज़ा ये हुआ कि मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ने लगा अस्पतालों में बेड कम पड़ने लगे जांच में कमी हो गई और टीके भी कम पड़ गए जिसके कारण शमशान घाट में चिताओं की लाइन लग गई शवों को जलवाने के लिए टोकन बटने लगे और एक बार फिर से लोगों के चेहरे पर मौत का भय दिखाई देने लगा।
न्यूज़ चैनलों, अखबारों में कोरोना से जुड़ी खबरे प्रमुखता से जगह बनाने लग गई तत्काल मुख्यमंत्री योगी को उत्तर प्रदेश के कई जिलों में रात्रि कर्फ्यू की घोषणा करनी पड़ी और उसके 1 हफ्ते के अंदर ही संडे को पूरा lock downघोषित हो गया।
सबसे पहले बच्चों के स्कूलों को बंद कर दिया गया और बच्चों को बिना परीक्षा दिए पास कर दिया गया नतीजा ये हुआ कि शिक्षा व्यवस्था धड़ाम हो गई और सबसे ज्यादा बुरी मार प्राइवेट स्कूल पर पड़ी जहाँ अप्रैल के महीने में बच्चे एडमिशन लेते थे वहीं स्कूल बंद होने से उन स्कूलों के शिक्षक सड़क पर आ गये और उनकी रोजी रोटी पर बहुत बुरा असर पड़ा। कोचिंग संस्थानों को बंद कर दिया गया जो शिक्षक पिछले एक साल से इस उम्मीद पर जी रहे थे कि महामारी खत्म होने पर उन्हें राहत मिलेगी वो फिर से रोजगार बंद होने पर नाउम्मीदी से घिर गए।
सरकार ने आदेश दिया कि बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन कराई जाए पर किसी ने ये नही बताया कि जो गरीब परिवार बच्चों की फीस न होने पर,ड्रेस के पैसे न होने पर,खाना नही खिला पाने पर सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ने भेजते हैं वो बच्चों को पढ़ाने के लिए महंगे मोबाइल और महंगे रिचार्ज कहाँ से लाएंगे।
ऐसे में गरीब बच्चों को मध्यम वर्ग के बच्चों को शिक्षा कैसे मुहैया कराई जाएगी। इस महामारी से देश आर्थिक,शैक्षिक रूप से कितने वर्षों पीछे जाने वाला है क्या सरकार को इसका कोई अंदाजा है और इससे बचने का क्या कोई उपाय है सरकार के पास।
देश में चुनाव पर रोक नही लगाई जाती और शिक्षा पर रोक लगाई जाती है।
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के चुनावों पर न रोक लगाई और न ही एक चरण में करने की कोई घोषणा की। एक ओर जनता पर मास्क न पहनने पर 1000 से 10000 रुपए तक जुर्माना लगा दिया गया वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री रैली और रोडशो में व्यस्त हैं एक देश एक कानून की बात करने वाली सरकार बड़ी बेशर्मी से एक देश में जहां लोग अस्पतालों में ,शव गृहों में, डॉक्टरों के पास लाइन में खड़े हो गए वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री अपनी चुनावी रैली में लोगों से भीड़ बढ़ाने की अपील करते रहे।
इन सबके बीच कई सवाल जो अनुत्तरित रह गए इस प्रकार हैं
1-कोरोना वायरस है भी या नही
2-गर है तो हर बार इसके लक्षण बदल क्यों जाते हैं
3-ठंड में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए
4-गर्मियों में ही क्यों आता है ये वायरस
5-नेताओं को क्यों नही होता इस वायरस का असर
6-टीका अगर इसका उपाय है तो जिनको टीके लग चुके उनपर इसका असर क्यों
7-अगर महामारी इतनी खतरनाक है तो चुनावी रैली पर रोक क्यों नही
8-क्या साधारण मास्क से वायरस को रोका जा सकता है
9-अगर महामारी थी तो अस्पताल और बेड का इंतजाम क्यों नही किया गया
10-कोरोना महामारी के बीच कुंभ मेले का आयोजन क्यों हुआ और उसपर रोक लगाने में देरी क्यों
11-क्या महामारी भी हिन्दू मुसलमान देख के फैलती है
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