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पापा की परी
प्रिया से मिले हुए मुझे लगभग 10 वर्ष बीत गए थे..और इस तरह मैं उसके परिवार के सभी सदस्यों से बिल्कुल घर की तरह परिचित था...उसकी छोटी बहन,छोटा भाई यहाँ तक कि उसके चाचा,चाची और उनके बच्चों से भी मेरा अच्छा परिचय हो गया था...
यही कोई आठवीं या नवीं क्लास में रही होगी जब वो मुझसे पढ़ने के लिए आई थी..पढ़ाई में प्रिया बहुत अच्छी होने के साथ साथ और भी कई काम जैसे क्राफ्ट,डांस में भी निपुण थी..अक्सर चिल्ड्रेन डे,टीचर्स डे और न्यू ईयर की पार्टी में वो सबसे आगे रहकर पूरी तैयारी करती और बाकी के बच्चों का उत्साह बढ़ाती थी...
समय के यूँ तो पंख नही होते पर फिर भी न जाने क्यों वो बहुत तेज़ी से उड़ कर चला ही जाता है...एक एक कर क्लास में अच्छे नम्बरों से पास होते होते उसने इंटर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी..और इसी बीच चंचल मन और सत्रह की उम्र में कब दोस्ती हो गई इसका पता प्रिया को भी नही चला...तभी तो साथ में पढ़ने वाले लड़के से उसकी दोस्ती पढ़ाई से कुछ ज्यादा हो चली थी और इसकी भनक मुझे अक्सर सुनाई पड़ जाती थी...कभी दोनों का एक दूसरे की बातों में ज्यादा दखल देना तो कभी मुझसे नज़र बचा के पैरों का आपस मे टकराना मुझे इस बात की आहट दे देता था...के कहीं न कहीं कोई खिचड़ी पक जरूर रही है..पर मुझे इससे क्या लेना देना...यही सोचकर मैंने कभी इस बात को ज़ाहिर नही होने दिया...
इंटर का रिजल्ट घोषित हो चुका था और प्रिया ने हाइस्कूल की तरह इंटर में भी टॉप किया था...मैं बहुत खुश था और एक शिक्षक को इससे ज्यादा क्या खुशी मिल सकती है कि उसके पढ़ाये हुए विद्यार्थी अच्छे अंको से पास हो जाएं...अब आगे क्या करोगी ? मैंने प्रिया से पूछा...बोली सर् बीटेक करने का सोच रही हूँ पापा की बहुत इच्छा है...और मैं पापा की सारी इच्छा पूरी करूंगी...पापा हम सभी भाई बहनों में सबसे ज्यादा मुझे चाहते हैं और में भी पापा से बहुत प्यार करती हूँ...
प्रिया के पापा एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे..और बच्चों के सभी शौक पूरे करने के लिए कड़ी मेहनत करते थे...अक्सर फीस जमा करते समय मेरी उनसे बातचीत हो जाया करती थी...प्रिया से उनको बहुत उम्मीदें थी ...कहते थे सर् हम अपनी प्रिया को जितना पढ़ेगी उतना पढ़ाएंगे... भले ही हमें कर्ज़ लेना पड़े...उनको काफी सालों से मधुमेह ने अपनी गिरफ्त में ले रखा था जो धीरे धीरे बढ़कर आंखों तक पहुँच गया था...जिसकी वजह से अब आंखों में दिखाई कम देने लगा था...परन्तु उन्होंने अपने बच्चों से ये बीमारी छुपा कर रखी थी...लेकिन बीमारियां भी भला कहीं छुप पाती हैं...प्रिया को उनकी बीमारी का पता चलने पर मेरे पास आकर मुझे बताया था और कई शिकायत भी की थी मुझसे मेरी ही...
बात कुछ इस तरह थी कि जिस दोस्त से करीबी बढ़ गई थी उसके कहने पर दोनों ने साथ साथ एक ही इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया था...एक साल बीत गया था और इस बीच प्रिया के कुछ सीनियर से उसकी अच्छी बनने लगी थी...पद्गने में तेज तो वो शुरू से थी और कॉलेज की फेयरवेल पार्टी में हुए डांस ने उसने सबका दिल जीत लिया था...और इसी बात से उसका दोस्त उससे कुछ उखड़ा उखड़ा रहा करता था...और प्रिया को भी ज्यादा रोकटोक पसंद नही आ रही थी...एक तरफ उसको अपने सीनियर से मदद और अपनापन मिल रहा था तो दूसरी तरफ उसके दोस्त के ज्यादा पजेसिव होने से उसे समस्या हो रही थी....
बस फिर क्या था वही हुआ जो कभी न कभी सबके साथ कॉलेज लाइफ में होता है...
उसने अपने दोस्त से अलग होने का निर्णय कर लिया था...और इसके लिए उसने उसको जमकर फटकार भी लगाई थी...अब किसी लड़के को यूं लड़की के मुँह से अपनी बेज्जती सहन करना कहाँ आसान होता है...उसने भी प्रिया को गुस्से में बोल दिया था कि ज्यादा बोली तो तेरी फोटोज वायरल कर दूंगा... ऐसी धमकी से प्रिया बहुत डर गई थी...उसने अपनी बहन से घर जाकर सारी बात बता दी...और बहन ने मां पापा से सारी बात बता दी...पापा को बहुत दुःख पहुँचा था...फिर भी उन्होंने प्रिया को साहस बंधाते हुए उस लड़के के घर वालों से पूरी बात करने का हौसला दिया था....
किसी शाम को कॉलेज से जल्दी आने का बाद प्रिया मेरे पास आई और उसने मुझसे अपनी सारी बात बताई...कोचिंग क्लास से लेकर इंजीनियरिंग कॉलेज तक की.... मैंने मुस्कुराते हुए कहा मुझे पहले से पता था...प्रिया नेशिकायत भरे लहजे में कहा- सर् आपको तो जब सब पता था तो आपने मुझे रोका क्यों नही? आप मुझे अगर डांट देते या मार देते तो आज ये नॉबत नही आती....मैं बोला बेटा मेरा उस समय तुम्हे डांटना या मारना तुम्हे समझ नही आता...और हो सकता है तुम कोचिंग ही छोड़ देती...इस उम्र में ये हो ही जाता है...तुम्हारा कोई दोष नही है...सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आये तो भूला नही कहलाता...अब अच्छे से मेहनत करो दिल लगा के पढ़ो...आंखों में आंसू आ गए थे उसके हाँ में सिर हिलाती हुए मानो ये कहना चाह रही थी कि ऐसा ही करूंगी...
इंजीनियरिंग का फाइनल सेमेस्टर जून में होना था और इसी बीच प्रिया की दिल्ली में जॉब लग गई....करीब एक साल तक वो दिल्ली में रही और मार्च में जब कोरोना महामारी के चलते सब बंद हो गया तो प्रिया भी अपने घर लौट आई थी...
मोबाइल फोन के स्टेटस भी बड़े अजीब होते हैं किसी के मन में क्या चल रहा है सारे राज बयां कर देता है...जैसे किसी का दिल टूटा हो तो शायरी और सैड सांग वाले स्टेटस...या फिर किसी का बर्थडे हो तो पार्टी वाले स्टेटस जिससे सब को खबर हो जाये...प्रिया के फ़ोन के स्टेटस भी उसके मन की स्थिति को बता देते थे...अक्सर उसके स्टेटस में मां पापा के साथ वाली फोटोज हुआ करती थी...जून में शादी की सालगिरह थी शायद तभी तो उसकी मां बिल्कुल दुल्हन की तरह सजी दिख रही थी और पापा भी नए कपड़े पहने दूल्हे की तरह दिखाई पड़ रहे थे...घर बहुत अच्छे से सजाया गया था...उसके छोटे भाई बहन भी दूसरी फोटोज में दिखाई दे रहे थे...
जुलाई के महीने में अचानक मेरी निगाह व्हाट्सएप के एक स्टेटस पर जा कर ठहर गई थी...जिसमें उसने अपने चाचा की फ़ोटो पट मिस यू लिख रखा था और रोने वाली इमोजी लगा रखी थी...अचानक ऐसे msg को देख कर मुझे झटका सा लगा...मैंने नीचे क्या हुआ ? प्रिया लिख कर भेजा... पर कोई रिप्लाई नही आया...अगले दिन भी कोई रिप्लाई नही आने पर मैंने प्रिया को फ़ोन मिला दिया...
ट्रिंग...ट्रिंग....घंटियों की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी...तभी फ़ोन उठा और दूसरी तरफ से हेलो की आवाज आई...आवाज प्रिया की थी मैंने पूछा चाचा को क्या हुआ प्रिया ?....रोई हुई आवाज में उसने जवाब दिया सर् चाचा की कोरोना से डेथ हो गई.....दिमाग एकदम सुन्न सा हो गया था मेरा....मुझे यकीन नही हो रहा था...उसके चाचा को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता था....हमेशा मुस्कराता हुआ चेहरा...कहीं बादलों में खो से गया था...इस खबर को सुनने का बाद...
मैंने फिर सवाल किया अचानक कैसे कोई बीमारी थी क्या उन्हें पहले से....नही बिल्कुल ठीक थे दो दिन से बुखार आ रहा था फिर सांस लेने में दिक्कत महसूस होने लगी उन्हें...हम लोग कार्डियोलॉजी ले गए वहां से उन्होंने हैलट अस्पताल भेज दिया....और वहां एक दिन आईसीयू में भर्ती हुए उसके बाद ठीक हो गए थे...वहां कोविड के पेशेंट आ रहे थे और चाचा के बेड के बगल में कई डेड बॉडी पड़ी हुई थी...जिसको देख के चाचा डर गए और घर ले चलने के लिए कहने लगे...चाचा कोरोना का मजाक उड़ाते थे और बोलते थे कि कुछ नही है...हमको कुछ नही होगा...पर अस्पताल में लोगों की डेड बॉडी अपने आस पास देखकर उनके मन में दहशत हो गई...और उनको अटैक पड़ गया... डॉ ने पहले बोला कि डेड बॉडी दे देंगे...कोरोना नही है पूरी रात जागते बीत गई के अब मिलेगी डेड बॉडी जिससे हम घर ले जा सके...पर अगले दिन डॉ ने ये कहते हुए के जांच पॉजिटिव आई है बॉडी नही मिलेगी...
जबसे पापा ने चाचा के बारे में सुन लिया है उनकी भी तबियत खराब हो गई है...मैंने तुरन्त उसको अपने घर को sainetize करने के लिए बोला और कहा अपना ख्याल रखो तुम लोग...कोरोना घर में आ गया है...वो बोली सर् पापा को भी है सबकी जांच हो चुकी है हम सब नेगेटिव आए हैं लेकिन पापा पॉजिटिव है...हम लोग उनको इटावा ले जा रहे हैं....क्योंकि कानपुर में बहुत लापरवाही हो रही है...एक दीदी ने सलाह दी है इटावा ले जाने की...मैंने कहा हां ठीक है वहां..तुम फ़ोन रखो और पापा को एडमिट कराओ जाकर... कोई दिक्कत हो तो हमें कॉल कर लेना...
दो दिन बीत गए मैंने प्रिया को पापा का हाल लेने के लिए फ़ोन लगाया...थोड़ी देर घंटी जाने के बाद प्रिया ने फ़ोन उठाया और बोली सर् पापा आईसीयू में है...डॉ ने सीरियस बताया है...पापा पहले से डाइबिटिक है और जबसे उन्होंने चाचा की डेथ के बारे में सुन लिया है वो बोल नही रहे थे...उनको सदमा लगा गया है चाचा का ...डॉ कह रहे हैं कि वो रिस्पांस नही दे रहे हैं...हालत गंभीर है...कहते कहते प्रिया का गला भर आया और वो फ़ोन पर ही रोने लगी...मैंने उसको दिलासा देने की भरपूर कोशिश की और कहा बेटा परेशान न हो...तुम उनके लिए प्रार्थना करो...प्रार्थना में बहुत ताकत होती है हम भी दुआ करेंगे वो जल्दी से जल्दी ठीक हो जाएं....
मन ही मन मेरे भी मन में शंका के बादल मंडरा रहे थे कि इनको डाइबिटीज़ है और कोरोना ऐसे लोगों को जल्दी पकड़ लेता है...बहुत देर तक उसको हौसला बंधाते बंधाते मेरी भी आंखे भर आईं थी...
दिनांक 25 जुलाई आखिरकार वही हुआ जिसका हम सबको डर था...प्रिया के पापा अब इस दुनिया में नही रहे...टूट चुकी थी वो...रोते रोते उसका बुरा हाल था...फ़ोन पर उसने मुझे ये जानकारी दी... मैं निःशब्द था...और कहता भी तो क्या जबकि मुझे भी पता था इस वक्त कोई शब्द,कोई तसल्ली उसके काम नही आने वाले...मैंने भी सोचा रो लेने दो उसे इससे ही मन हल्का हो पाएगा... क्योंकि इस घड़ी में सारी सांत्वना, सारी हमदर्दी बेमानी लगती है...पिता उस बादल की तरह होता है हम सब पर जो सूरज की तेज धूप खुद सहन कर लेता है...पर अपनों को धूप लगने नही देता...आज ईश्वर ने उसके सिर से बादल छीन लिया था... और सारी जिंदगी वो पापा शब्द से महरूम रहने वाली थी...वो शख्स जो किसी भी लड़की का पहला हीरो,सुपरमैन होता है...आज उससे बहुत दूर जा चुका था...और शिवाय याद के कुछ शेष नही था....
मैंने ज्यादा बात नही की और फ़ोन रख दिया था...तकलीफ का यही तो रोना है...हम सामने वाले के दर्द को महसूस तो कर सकते है पर बांट नही सकते...सबको अपने अपने हिस्से का दुःख खुद ही काटना पड़ता है...शायद यही हम सबकी नियति है.
एक महीना बीत गया...उसके स्टेटस में रोजाना पापा के साथ उसकी फोटो और पापा तुम लौट आओ लिखा संदेश पढ़ने को मिलता...अलग अलग मौके पर ली गई फ़ोटो और रोने वाली इमोजी ने प्रिया को अंदर तक तोड़ दिया था..
एक दिन मेरी मुलाकात रास्ते में प्रिया से हुई...पापा की lic के बारे में उसकी मां को कुछ बात करनी थी...मैंने कहा माँ को भेज देना मेरे पास हम देख लेंगे पेपर...जो भी बन सकता है हम कोशिश करेंगे कि जल्दी से जल्दी मिल जाये...देख लीजियेगा सर् और अगर कोई जॉब हो तो बताइएगा क्योंकि सारे पैसे पापा इलाज में खर्च हो गए...और कोई रिश्तेदार भी घर पर मदद के लिए नही आया...पापा के रहते कभी कोई दिक्कत नही समझ आई...और अब कहते कहते उसकी आँखों में आंसू भर आए और मेरी भी पलकें भीग उठी...हाँ जरूर बेटा... हम है न तुम अपने आप को अकेला न समझो...कभी कभी कहीं भी मेरी जरूरत हो मुझे कॉल करना... हम पापा की कमी तो नही पूरी कर सकते लेकिन हमसे जो भी बन पायेगा हम करेंगे...हम हमेशा तुम्हारे साथ है...चिंता मत करो...मुझसे मेरे आंसू संभालना बहुत मुश्किल हो रहा था...अच्छा तुम घर जाओ ये कहकर में अपने गंतव्य को बढ़ गया था
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